Monday, 1 September 2014

Thirty human mistakes...इन्सान की तीस गलतिया


इन्सान की तीस गलतिया


1. इस ख्याल में रहना कि जवानी और
तन्दुरुस्ती हमेशा रहेगी।
2.
खुद को दूसरों से बेहतर समझना।
3.
अपनी अक्ल को सबसे बढ़कर समझना।
4.
दुश्मन को कमजोर समझना। 
5.
बीमारी को मामुली समझकर शुरु में इलाज
करना।
6.
अपनी राय को मानना और दूसरों के मशवरें
को ठुकरा देना।
7.
किसी के बारे में मालुम होना फिर
भी उसकी चापलुसी में बार-बार जाना। 
8.
बेकारी में आवारा घुमना और रोज़गार
की तलाश करना।
9.
अपना राज़ किसी दूसरे को बता कर उससे
छुपाए रखने की ताकीद करना।
10.
आमदनी से ज्यादा खर्च करना।
11.
लोगों की तक़लिफों में शरीक होना, और
उनसे मदद की उम्मीद रखना।
12.
एक दो मुलाक़ात में किसी के बारे में
अच्छी राय कायम करना।
13.
माँ-बाप की खिदमत करना और
अपनी औलाद से खिदमत की उम्मीद रखना। 
14.
किसी काम को ये सोचकर
अधुरा छोड़ना कि फिर किसी दिन पुरा कर
लिया जाएगा।
15.
दुसरों के साथ बुरा करना और उनसे अच्छे
की उम्मीद रखना।
16.
आवारा लोगों के साथ उठना बैठना। 
17.
कोई अच्छी राय दे तो उस पर ध्यान
देना।
18.
खुद हराम हलाल का ख्याल करना और
दूसरों को भी इस राह पर लगाना।
19.
झूठी कसम खाकर, झूठ बोलकर,
धोखा देकर अपना माल बेचना, या व्यापार करना।
20.
इल्म, दीन या दीनदारी को इज्जत
समझना।
21.
मुसिबतों में बेसब्र बन कर चीख़ पुकार
करना।
22.
फकीरों, और गरीबों को अपने घर से धक्का दे
कर भगा देना।
23.
ज़रुरत से ज्यादा बातचीत करना।
24.
पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार
नहीं रखना।
25.
बादशाहों और अमीरों की दोस्ती पर यकीन
रखना।
26.
बिना वज़ह किसी के घरेलू मामले में दखल
देना।
27.
बगैर सोचे समझे बात करना।
28.
तीन दिन से ज्यादा किसी का मेहमान बनना।
29.
अपने घर का भेद दूसरों पर ज़ाहिर करना।
30.
हर एक के सामने अपना दुख दर्द सुनाते
रहना।





Saturday, 19 July 2014

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत..yada yada hi dharmasya glanir bhavati bharata



यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
भावार्थहे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ॥7

परित्राणाय साधूनां विनाशाय दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे
भावार्थसाधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥8

Wednesday, 23 April 2014

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान

      देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान
      कितना बदल गया इनसान कितना बदल गया इनसान
      सूरज न बदला चांद न बदला ना बदला रे आसमान
      कितना बदल गया इनसान कितना बदल गया इनसान

               आया समय बड़ा बेढंगा
               आज आदमी बना लफ़ंगा
               कहीं पे झगड़ा कहीं पे दंगा
               नाच रहा नर हो कर नंगा
               छल और कपट के हाथों अपना
               बेच रहा ईमान, कितना ...

               राम के भक्त रहीम के बंदे
               रचते आज फ़रेब के फंदे
               कितने ये मक्कर ये अंधे
               देख लिये इनके भी धंधे
               इन्हीं की काली करतूतों से
               बना ये मुल्क मशान, कितना ...

               जो हम आपस में न झगड़ते
               बने हुए क्यों खेल बिगड़ते
               काहे लाखों घर ये उजड़ते
               क्यों ये बच्चे माँ से बिछड़ते
               फूट\-फूट कर क्यों रोते
               प्यारे बापू के प्राण, कितना ...


Monday, 24 March 2014

dekh sudama ki deen dasha karouna karke karuna nidhi roe .....


dekh sudama ki deen dasha karouna karke karuna nidhi roe 
pani paraat ko haath chhuyo nhi nainan k jal so pag dhoye 
pani paraat ko haath chhuyo nhi nainan k jal so pag dhoye

JaI Balaji Maharaj

Friday, 21 February 2014

maiya mori main nahin makhan khayo...मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो



मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो,

भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ।
चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ॥
मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ॥
तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥
यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ।
'सूरदास' तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥



Jai Balaji Maharaj

Sunday, 2 February 2014

मंगल भवन अमंगल हारी


                                         मंगल भवन अमंगल हारी
                                          द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी
                                   राम सिया राम सिया राम जय जय राम - २

हो, होइहै वही जो राम रचि राखा
को करे तरफ़ बढ़ाए साखा
हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी
आपद काल परखिये चारी
हो, जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू
हो, जाकी रही भावना जैसी
रघु मूरति देखी तिन तैसी
रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
हो, हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता
राम सिया राम सिया राम जय जय राम